Tuesday, February 2, 2010

कब कटेगी चौरासी: चेहरे की धूल दिखाता आईना


पुस्तक समीक्षा

पुस्तक : कब कटेगी चौरासी

लेखक : जरनैल सिंह

कीमत : 99 रुपए

प्रकाशक: पेंगुइन बुक्स

लेखन की सार्थकता अगर संवेदना को छूने में है तो कब कटेगी चौरासी इससे कुछ आगे निकल जाती है. इसलिए क्योंकि यह हमारी संवेदना को सिर्फ छूती ही नहीं बल्कि झकझोर देती है, सावधान भी करती है कि सभ्यता के विकास के तमाम दावों के बावजूद हम अब भी काफी हद तक अपनी आदिम पाशविक प्रवृत्तियों से बंधे हुए हैं. इसे पढ़ते हुए लगातार लगता है कि हमने इतिहास से कुछ नहीं सीखा और बरबस ही नाजी कैंपों और बंटवारे पर लिखी गई किताबों के अंश या इन घटनाओं पर बनी फिल्मों के दृश्य मन में कौंधते हैं. किताब की प्रस्तावना में चर्चित लेखक खुशवंत सिंह लिखते हैं कि यह उन सभी लोगों को पढ़नी चाहिए जो चाहते हैं कि ऐसे भयानक अपराध दोबारा न हों. उनकी बात बिल्कुल सही है. अगर इसे पढ़कर बतौर समाज हमें अपना अक्स धुंधला नजर आए तो कसूर इस आईने का नहीं बल्कि हमारे चेहरे पर पड़ी धूल का होना चाहिए.

कब कटेगी चौरासी के लेखक हैं कुछ समय पहले एक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान गृहमंत्री पी चिदंबरम की तरफ जूता उछालकर चर्चा में आए पत्रकार जरनैल सिंह. उनके मुताबिक इसे लिखने का उद्देश्य 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए सिखों के नरसंहार की बर्बरता और उसके बाद भी अब तक लगातार जारी अन्याय का सच सामने लाना है. वे लिखते भी हैं, ‘जूते से विरोध प्रकट कर दुनिया को इस अन्याय की याद तो दिला दी पर इस अन्याय को किताब के तौर पर सामने लाकर दोषियों को शर्मिंदा करना होगा.इसके बाद जरनैल लिखते हैं,‘सिखों के साथ हुए अन्याय के खिलाफ उनके दर्द और रोष को अपने सांकेतिक विरोध के जरिए प्रकट करने के बाद मुझे तिलक विहार और गढ़ी में 1984 के पीड़ितों की विधवा कॉलोनियों में जाने का मौका मिला. उनकी दयनीय स्थिति को देखकर और दर्दनाक कहानियों को सुनकर दिल और ज्यादा दुख से भर गया. मैंने देखा कि 1984 के कत्लेआम को उस तरह से कवर ही नहीं किया गया जिस तरह से किया जाना चाहिए था..लगा कि इस दास्तान को दुनिया के सामने लाना बेहद जरूरी है.

इस तरह देखा जाए तो यह एक तरह से भुक्तभोगियों द्वारा अपनी व्यथा का मार्मिक वर्णन है जिसके जरिए कुछ अहम सवाल उठाए गए हैं. चूंकि जरनैल पत्रकार हैं और बेहद आहत भी, इसलिए इस काम में उन्होंने अपनी पत्रकारीय प्रतिभा के साथ निजी भावनाओं का मेल भी कर दिया है जो किताब पढ़ते हुए महसूस भी होता है. दंगा पीड़ितों की जिंदगी के दुखद अध्याय के साथ चलती गई उनकी कलम ने अपने दिल का गुबार भी जी-भर उड़ेला है. उन्हीं के शब्दों में अगर किसी भूकंप या तूफान में लोग मारे गए हों तो अलग बात है पर कत्लेआम को कैसे भूल जाएं? खासकर जब तक न्याय न हुआ हो..भूल जाना कोई हल नहीं है. इतिहास से सबक लिया जाता है न कि उसे भूला जाता है. सबक इसलिए ताकि वैसी गलतियां फिर न दोहराई जाएं. जरूरत भूलने की नहीं, न्याय करने की है.

84 के पीड़ितों की कहानियां अखबारों या पत्रिकाओं के जरिए टुकड़ों-टुकड़ों में पहले भी कही गई हैं मगर हिंदी में उन्हें एक किताब के रूप में सामने लाने का शायद यह पहला प्रयास है. समीक्षा के लिहाज से देखा जाए तो इसमें कुछेक दोष जरूर हैं मगर जब त्रासदी इतनी विकराल और हृदयविदारक हो तो उसके वर्णन में हुए चंद भाषागत और भावनात्मक दोष ज्यादा मायने नहीं रखते.

महान कथाकार शैलेश मटियानी कभी कह गए थे कि समाज की संवेदना को बचाए रखने का काम ईश्वर और प्रकृति ने लेखक पर छोड़ा है. जरनैल ने अपनी यह जिम्मेदारी सच्चे मन और अच्छे ढंग से निभाई है.

विकास बहुगुणा

उन आंखों से वाबस्ता अनजान अफसाने


तवायफें कभी तहजीब की पाठशाला हुआ करती थीं. कई कलाएं उनकी बदौलत ही समाज को मिलीं और इसलिए एक दौर में समाज ने भी उन्हें ऊंचा दर्जा दिया. फिर दौर बदला. तवायफें पहले बदनाम हुईं, फिर गुमनाम और आखिर में उनका नाम ही गाली हो गया. तृषा गुप्ता और विकास बहुगुणा का आलेख

सबा दीवान की हालिया डॉक्यूमेंट्री फिल्म द अदर सांग के एक दृश्य में कैमरा एक पुराने अलबम पर फोकस होता है और इस पर चलती हुई उंगली एक गोल और सुंदर से चेहरे पर ठहर जाती है. फिर एक सारंगीवादक की खरखरी-सी आवाज आती है, ‘ये रसूलन बाई हैं.’ फिल्मकार पूछती हैं, ‘क्या ये हमेशा इतने सादे कपड़े पहनती थीं?’ जवाब आता है, ‘मुजरा नाच तो करना नहीं था.’

‘हालांकि यह साफ था कि ये महिलाएं लड़ाई करनेवाली नहीं थीं, मगर फिर भी उन्हें बागियों को भड़काने और उनकी आर्थिक सहायता करने की सजा मिली’

रसूलन बाई ने 1948 में मुजरा छोड़ दिया था. कथक आधारित यह भावपूर्ण नृत्य तवायफों की पहचान हुआ करता था. इसके बाद उन्होंने अपना कोठा भी छोड़ दिया और बनारस की एक गली में बने मकान में रहने लगीं. रसूलन बाई, जिनके दर्दभरे गीत शायद भारत में ठुमरी की सबसे मशहूर प्रस्तुतियां थे, अब अपने ही शहर में गाना छोड़ चुकी थीं.

उमराव जान, पाकीजा, देवदास...तवायफों के बारे में हमारी जानकारी और धारणा को काफी हद तक हिंदी फिल्मों ने ही ढाला है. इसलिए दीवान की इस फिल्म में श्वेत-श्याम तस्वीरों में नजर आती रसूलन बाई जैसी तवायफों को देख कर थोड़ा अजीब-सा लगता है. दरअसल आज तवायफ शब्द के साथ जो छवि चस्पां हो चुकी है, उसे देखकर कल्पना करना मुश्किल होता है कि कभी तवायफों को बहुत सम्मान की नजर से देखा जाता था और शायरी, संगीत, नृत्य और गायन जैसी कलाओं में उन्हें महारत हासिल होती थी. तहजीब की तो उन्हें पाठशाला ही समझ जाता था और बड़े-बड़े नवाबों के साहबजादों को तहजीब सीखने के लिए बाकायदा उनके पास भेजा जाता था.अपनी कुशल राजनीतिक समझ के बल पर उत्तर प्रदेश की सरधना रियासत की शासक बननेवाली बेगम समरू एक तवायफ थीं. कला और पत्र व्यवहार के क्षेत्र में माहिर मोरन सरकार 1802 में महाराजा रंजीत सिंह की रानी बनीं. महाराजा ने उनके चित्रवाले सिक्के भी चलाए.

गौर करें कि यह उस जमाने की बात हो रही है जब आम महिलाओं का पढ़ना-लिखना तो दूर घर से बाहर निकलना भी दुर्लभ होता था. उस दौर में तवायफों के पास सारे अधिकार होते थे. यहां तक कि वे चाहें तो शादी करके घर भी बसा सकती थीं और उनसे शादी करनेवाले को बहुत किस्मतवाला समझ जाता था. ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में लखनऊ की तवायफें राजकीय खजाने में सबसे ज्यादा कर जमा करनेवाले लोगों में से हुआ करती थीं. ये दस्तावेज लखनऊ नगर निगम के रिकॉर्ड रूम में आज भी रखे हुए हैं.

तवायफों का सबसे सुनहरा दौर शुरू हुआ 18वीं सदी के आखिर में जब मुगलिया सल्तनत बिखर रही थी. उस वक्त कई आजाद रियासतें बन चुकी थीं. इन रियासतों ने तवायफों को वित्तीय संरक्षण दिया. बदले में तवायफें उन रियासतों की कला और संस्कृति की संरक्षक बनीं. उनकी वजह से कथक, ठुमरी, गजल, दादरा जैसी कलाएं फली-फूलीं.

फिर ब्रिटिश हुकूमत शुरू हुई. अब चूंकि अंग्रेज अपनी संस्कृति को सर्वश्रेष्ठ मानते थे और उन्होंने भारत को जीता था तो वे इस संस्कृति को भारतीयों पर भी लादना चाहते थे. मगर उन्हें भी अहसास था कि यह काम आसान नहीं है. इसके लिए उन्होंने दो काम साथ-साथ किए. पहला यहां की शिक्षा पद्धति बदली और दूसरा भारतीय संस्कृति के कई प्रतीकों पर हमला किया जिनमें तवायफें भी एक थीं. पाश्चात्य सभ्यता से आकर्षित नवभारतीय मध्य वर्ग ने भी इस काम में उनका साथ दिया. यह प्रक्रिया भारत की आजादी के बाद भी जारी रही और इस प्रक्रिया में तवायफ की छवि बिल्कुल ही बदल दी गई.

‘इस दौरान अंग्रेजों की संस्कृति के प्रभाव तले उभरते मध्य वर्ग ने लगातार तवायफों को अनैतिक और पतनशील करार दिया और हिंदुस्तानी संगीत को उनसे ‘बचाने’ के लिए कई कोशिशें शुरू कीं’तवायफ शब्द दरअसल अरबी भाषा के शब्द तायफा का बहुवचन है, जिसका अर्थ होता है समूह. इतिहासकार कैथरीन बटलर ब्राउन के मुताबिक इस शब्द का पहले-पहल इस्तेमाल दरगाह कुली खान द्वारा 1739 में लिखे गए मरकबा-ए-दिल्ली में गायिकाओं और नर्तकियों के समुदायों के लिए देखने को मिलता है. मगर आम प्रचलन में यह शब्द 19वीं सदी में ही आया. ब्राउन कहते हैं कि तब तवायफों के दो वर्ग होते थे. पहले वर्ग में वे तवायफें थीं जो तहजीब की मिसाल और गाने में कमाल हुआ करती थीं और जिन्हें इस वजह से काफी क्षत हासिल होती थी. आमतौर पर ऐसी तवायफों का रिश्ता जिंदगी भर एक ही शख्स से होता था और वह होता था उनका संरक्षक. दूसरे वर्ग में वे तवायफें थीं, जिनमें गाने के मामले में उतनी प्रतिभा नहीं होती थी और इस कारण वे देह-व्यापार पर ज्यादा निर्भर होती थीं.

मगर 1857 के बाद यह स्थिति तब बदल गई, जब पूरे भारत में ब्रिटिश क्राउन लॉ लागू हो गया. इस कानून के तहत सभी तवायफों को वेश्या का दर्जा देकर उनकी गतिविधियों को अपराध की श्रेणी में रख दिया गया. कई अदालतों ने फैसले दिए कि नाचना और गाना तो बस नाम के लिए है और तवायफों की असली कमाई वेश्यावृत्ति से हो रही है. तवायफों के खिलाफ ब्रिटिश हुकूमत के इस अभियान की एक अहम वजह यह भी बताई जाती है कि अंग्रेजों को पता चल गया था कि 1857 की क्रांति की योजना बनाने की जगह के रूप में कोठों की भी मुख्य भूमिका थी. अपनी पुस्तक द मेकिंग ऑफ कॉलोनियल लखनऊ में इतिहासकार वीना तलवार ओल्डनबेर्ग लिखती हैं, ‘हालांकि यह साफ था कि ये महिलाएं लड़ाई करनेवाली नहीं थीं, मगर फिर भी उन्हें बागियों को भड़काने और उनकी आर्थिक सहायता करने की सजा मिली.’

ब्राउन बताते हैं, ‘इस दौरान अंग्रेजों की संस्कृति के प्रभाव तले उभरते मध्य वर्ग ने लगातार तवायफों को अनैतिक और पतनशील करार दिया और हिंदुस्तानी संगीत को उनसे ‘बचाने’ के लिए कई कोशिशें शुरू कीं.’ राष्ट्रीय संगीत बनाने के लिए अभियान चला जिसका मकसद संगीत को मध्य वर्ग की महिलाओं के लिए अनुकूल बनाना था. ऐसे में इसे तवायफों और मुस्लिम संगीतकारों से अलग करने के प्रयास हुए.

तवायफों पर दोहरी मार पड़ रही थी. एक तरफ तो ब्रिटिश हुकूमत उन्हें परेशान कर रही थी और दूसरी तरफ उन्हें मिलनेवाला वह सामंती संरक्षण भी कम होता जा रहा था, जिससे कोठे और उनकी कलाएं फलती-फूलती थीं. ऐसे में तवायफों ने दूसरे विकल्पों की तरफ रुख किया. वह समय रेडियो का था जो उनके लिए एक राहत भरा विकल्प साबित हुआ. ऑल इंडिया रेडियो अपने शुरुआती दिनों में पूरी तरह से गानेवालियों पर निर्भर था. यही हाल रिकॉर्डिंग कंपनियों का भी था. ग्रामोफोन के दौर की जब शुरुआत हुई थी, तो गौहर जान जैसी तवायफों की धूम किसी सुपरस्टार से कम नहीं थी.

अब समाज में संगीत के नए संरक्षक थे जिन्होंने अपने दरवाजे तवायफों के लिए बंद कर दिए थे. ऐसे में तवायफों ने थियेटर, रेडियो और फिल्म जगत का रुख किया. किदवई कहते हैं, ‘सिनेमा तवायफों के इतिहास का एक हिस्सा है, जिसमें तवायफी कला के ऐसे-ऐसे पहलू दिखाए गए हैं जो हम आगे कभी नहीं देख पाएंगे. इसने तवायफों को एक नई जिंदगी दी, स्क्रीन पर भी और उससे इतर भी.’ सिद्धेश्वरी जैसी तवायफों ने तो अंग्रेजी में भी गाना सीखा.

वह समय बड़ा असाधारण था. इस दौरान ठुमरी कोठे से बाहर निकली. गायन की एक ऐसी अंतरंग और भावपूर्ण शैली जो हमेशा महिलाओं का क्षेत्र रही थी तवायफों के कोठों को छोड़ आगे बढ़ी. आधुनिकता की चकाचौंध के हमले से बचने के लिए उसे ऐसा करना पड़ा. अब वह कंसर्ट हॉल, रेडियो और सिनेमा में आ चुकी थी. इस नई और बदली हुई दुनिया में तवायफ को खुद ही गानेवाली या गायिका बनना पड़ा. इस रूपांतरण की सबसे मशहूर मिसाल हैं अख्तरी बाई फैजाबादी जो बाद में बेगम अख्तर के नाम से जानी गईं. छोटी उम्र में ही प्रसिद्ध होनेवाली अख्तरी बाई ने बाद में शादी कर ली थी और कई साल तक गाना भी छोड़ दिया था. जसा कि लेखिका रेग्यूला कुरैशी लिखती हैं, ‘बाद में वे दुनिया के सामने पूरी तरह से बदले हुए रूप में आईं और एक देश की संगीत विरासत का राष्ट्रीय प्रतीक बन गईं.’

मगर इसके अपने नुकसान थे. नए भारत की आवाज बनने के लिए अख्तरी बाई को एक दोहरी जिंदगी जीनी पड़ी. इतिहासकार सलीम किदवई की मानें तो उनका आदर अपने अतीत के एक-एक टुकड़े से खुद को अलग कर लेने पर निर्भर था जबकि दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देने की उनकी क्षमता की जड़ें काफी हद तक इसी अतीत से जुड़ी हुई थीं.तवायफों को मिले इस नवजीवन के कुछ हैरत भरे पहलू भी हैं. फिल्म अभिनेत्री नरगिस का ही मामला लें, जिनकी मां जद्दन बाई भी मशहूर तवायफ थीं. हालांकि अपनी बेटी को फिल्मों के लिए तैयार करते हुए जद्दन बाई ने उसे गाने के अलावा सब-कुछ सिखाया. यह भी एक विरोधाभास ही था कि जद्दन बाई जहां अपनी सुरीली आवाज के लिए जानी जाती थीं, वहीं उनकी बेटी नरगिस के स्टारडम में उनकी गायिकी की कोई भूमिका नहीं थी. यानी नए दौर के साथ तवायफ की भूमिका भी बदल रही थी. पहले नृत्य या मुजरा, फिर सिर्फ गायन और फिर केवल अभिनय. यहां पर हालांकि यह भी कहा जा सकता है कि शायद ऐसा पार्श्वगायन की कला के उभरने से हुआ होगा.

तवायफों का दौर भले ही बीत गया था, मगर उनकी प्रासंगिकता खत्म नहीं हुई थी. जैसा कि दीवान कहती हैं, ‘मुजरे को हिंदी फिल्मों के जरिए फिर से जिंदा करने की कोशिश हुई है. मुंबई के बारों में लड़कियां तथाकथित भारतीय पोशाक घाघरा-चोली पहनती थीं. इसकी कुछ वजह यह है कि ‘भारतीय नृत्य’ के लिए लाइसेंस लेना आसान हो जाता है और यह भी कि यह दर्शकों को पसंद आती है. वहां पर जानेवाला आदमी यह कल्पना कर लेता है कि उसके सामने फिल्म स्टार रेखा नाच रही है.’ हालांकि बार डांसरों और तवायफों का यह सतही दिखता रिश्ता वास्तव में कहीं गहरा है. संगीत और नृत्य के सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं का अध्ययन करनेवालीं अन्ना मोरकॉम बताती हैं कि मुंबई की बार डांसरों का 80 से 90 फीसदी हिस्सा डेरेदार, नट, बेड़िया और कंजर जैसी जातियों से आता है, जिनका परंपरागत पेशा ही इस तरह का रहा है. 2005 में मुंबई के डांस बारों में नृत्य पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जो अब तक जारी है. इससे 75 हजार ऐसी लड़कियों की जीविका छिन गई.

20वीं सदी की शुरुआत में भारतीय समाज में नृत्य को गलत नजर से देखा जाने लगा था. मध्य वर्ग ने नृत्य के खिलाफ चले अभियान में प्रमुख भूमिका निभाई थी. कोठों पर हर तरफ से मार पड़ रही थी. ऐसे में तवायफों ने अपना सम्मान बनाए रखने के लिए मुजरा छोड़ा और गायन या अभिनय का विकल्प चुना. मगर विडंबना देखिए कि अब उसी मध्यवर्ग द्वारा नृत्य को सम्मान की दृष्टि से देखा जाने लगा है. शामक डावर, प्रभुदेवा जैसे स्टार, बूगी-वूगी और डांस इंडिया डांस, नच बलिये जैसे टीवी शो की लोकप्रियता और रब ने बना दी जोड़ी जैसी फिल्में इसका उदाहरण हैं. तवायफें तो नहीं रहीं मगर सौभाग्य से उनकी कला उनके साथ ही खत्म नहीं हुई. शास्त्रीय संगीत और नृत्य को अब वही मध्य वर्ग संरक्षण दे रहा है जिसने कभी तवायफों का जीना मुश्किल कर दिया था.

Sunday, January 17, 2010

दिल लगा हरसिल में (अंतिम)




हरसिल आने से तकरीबन दस किमी पहले चढ़ते-चढ़ते रास्ता पहाड़ के शिखर तक पहुंच जाता है जहां से फिर ढलान शुरू होती है. इस जगह के तो क्या कहने. लगता है जैसे आसमां छू लिया हो. जहां भी देखिए सामने बर्फ से ढके पहाड़ और उनसे अठखेलियां करते बादल. नीचे गहरी घाटी में नजर आती भागीरथी. पहाड़ में ऐसा आमतौर पर होता ही है कि ऐसी जगहों पर हवा अपने सबसे उच्श्रृंखल रूप में होती है. दायें, बाएं, ऊपर, नीचे...हर तरफ से आप पर हमला बोलती.यहां पर बसस्टैंडनुमा एक ढांचा भी बना है, शायद पर्यटकों के दृश्याअवलोकन के लिए, मगर इसकी कोई खास जरूरत नहीं आती क्योंकि अवलोकन कहीं से भी करिए, नजारे ही नजारे नजर आते हैं. हां, बरसात में यह जरूर कुछ काम आ सकता है.

खैर हमने यहां पर कुछ फोटो खिंचवाईं और फिर बढ़ चले आगे. ढलान खत्म होने के बाद भागीरथी पर बना पुल पार किया जिसके बाद हल्की चढ़ाई शुरू हो गई. हरसिल अब बस पांच किमी रह गया था. लेकिन उसकी जगप्रसिद्ध खूबसूरती का विस्तार यहीं से दिखने लगा था. और फिर देखते ही देखते हमारी मंजिल आंखों के सामने आ गई.




दो बार कश्मीर भी जा चुका हूं और यकीन मानिए ये जगह उतनी ही खूबसूरत है.काफी कुछ पहलगाम जैसी...देवदार का घना जंगल. पर्वतों से उतरते झरने, अठखेलियां करती नदी...




सामरिक लिहाज से अहम इलाका है हरसिल इसलिए विदेशी पर्यटकों को यहां रात में रुकने की इजाजत नहीं. कैंट एरिया होने की वजह से सेना की भी मौजूदगी अच्छी खासी है. ठहरने के लिए जीएमवीएन रेस्ट हाउस, लोक निर्माण विभाग का बंगला और कुछ स्थानीय निजी होटल हैं. निजी होटल तो सर्दियों में बंद ही रहते हैं. लोक निर्माण विभाग के बंगले में रुकने के लिए उत्तरकाशी के जिलाअधिकारी से परमिशन लेनी होती है.जीएमवीएन रेस्ट हाउस बारामासी खुला होता है और किसी परमिशन की भी जरूरत नहीं. गर्मियों में ऑनलाइन बुकिंग की एहतियात जरूर रखें और सर्दियों में तो अक्सर इसके बगैर ही काम चल जाता है. एक जवान से रेस्ट हाउस का पता पूछा और पांच मिनट में वहां पहुंच गए. खुशकिस्मती से कमरा मिल गया. मैनेजर ने बताया कि अच्छा किया कि आप आज आए क्योंकि कल से तो सारे कमरे बुक हैं. लोग यहां नए साल का जश्न मनाने आ रहे हैं.

हमने भी सोचा कि चलो ठीक है. कल की रात यहां गुजारते तो वही सब दिखता जो मसूरी और शिमला में दिखता है. आज तो अपने मतलब का माहौल है. थोड़ी देर आराम करने के बाद मैंने ज्यो से कहा कि चलो नदी किनारे चलते हैं. लेकिन उसे भूख लगी थी और उसने कहा कि कुछ खाने के बाद ही चलेंगे. शाम के चार बज रहे थे और रेस्ट हाउस की मेस में ज्यादा से ज्यादा सैंडविच ही मिल सकता था इसलिए हम कोई और जुगाड़ देखने थोड़ी दूर बनी कुछ दुकानों की तरफ निकल लिए.

यहीं पर अपनी दुकान चलाते हैं हरिमोहन जोशी जिनके यहां ब्रेड ऑमलेट और मैगी मिल रही थी. हमने भी ऑर्डर दिया और इन व्यंजनों का ऐसा स्वाद अरसे बाद मिला. जोशी जी ने बताया कि इन दिनों तो यहां के ज्यादातर निवासी नीचे के बनिस्बत गर्म इलाकों में बने अपने घरों में चले जाते हैं. यहां की गढ़वाली और तिब्बती मूल वाले लोगों की मिश्रित आबादी का छह महीने ठिकाना वहीं होता है. गर्मियों में ये लोग फिर हरसिल आ जाते हैं. जोशीजी बारामासी यहीं रहते हैं. दुकान जो चलानी है. सर्दियों में भी सेना के जवानों की बदौलत चल जाती है उनकी दुकान.




पेटपूजा कर हम थोड़ी देर के लिए घूमने निकले. मगर हवा ऐसा आतंक बरपा रही थी कि ज्यादा दूर जाने की हिम्मत नहीं हुई. एक पल के लिए सोचा कि नदी किनारे तो और बुरा हाल होगा तो प्रोग्राम कैंसल कर दिया जाए. मगर अपने प्रिय शौक को टालने की दिल इजाजत नहीं दे सका और पहुंच गए हम नदी किनारे. सफेद रेत, नदी के साथ बहकर वक्त के सफर में चिकने हो गए पत्थर और फिर पानी की धारा. बस आग की कमी थी. थोड़ी ही दूर किसी ने कुछ समय पहले एक पेड़ की लकड़ियां काटी थीं. लकड़ियां तो वो बटोर कर ले जा चुका था मगर जूठन यानी थोड़े बहुत छिलके वहां पड़े थे. पेड़ देवदार का था जिसमें रेजिन की मात्रा खूब होती है. पहाड़ी होने का अनुभव यहां काम आया. इनके साथ नदी किनारे पानी के साथ बहकर आईं और रेत में जहां-तहां पड़ीं कुछ और लकड़ियां इकट्ठी कर लीं. इसके बाद थोड़ी सी सूखी घास जमा की, उसके ऊपर देवदार के छिलके लगाए और फिर लकड़ियां. आग लगने के लिए आदर्श स्थिति बन चुकी थी.

मगर उत्साह तब हवा होने लगा जब हर तरफ से हमला करने पर आमादा हवा ने माचिस की पच्चीस-तीस तीलियां बर्बाद कर दीं. नदी किनारे होने के कारण हवा और तेज थी. हम तीली झाड़ें कि पलक झपकते ही वो बुझ जाए. कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें. तभी थोड़ी ही दूर फड़फड़ा रही एक किताब दिख गई. उम्मीद की कुछ किरण नजर आई. एक कागज फाड़ा और किताब की ही आड़ बनाकर कोशिश की. कागज सुलग गया और फिर घास भी, फिर तो कोई समस्या ही नहीं थी.




इसके बाद खूब देर तक बैठे रहे. आग सेकते हुए बातें भी कीं और चुप भी रहे. आसमान में लाल रंग के न जाने कितने शेड्स बिखरे हुए थे. कुछ देर बाद शाम का पिघलता सोना धीरे-धीरे बर्फ की चोटियों से सिमटने लगा. घाटी अब धीरे-धीरे अंधेरे की चादर ओढ़ रही थी. लग रहा था मानो अब वक्त भी थमकर थोड़ा सुस्ता लेना चाहता हो.हम अपने इस सफर का सबसे यादगार लम्हा जी रहे थे.

कहते हैं जवानी की अच्छी यादें वो आग होती हैं जिन्हें तापकर इंसान बुढ़ापे का जाड़ा मजे में काट सकता है. भली कही जिनने भी कही...





Wednesday, January 13, 2010

दिल लगा हरसिल में-4


लेकिन जैसा कि अंग्रेजी में कहावत है ओल्ड हैबिट्स डाइ हार्ड...घोड़े बेचकर जो सोए तो ठंड और आलस ने आठ बजे तक पहले कोमा और फिर नौ बजे तक नीम बेहोशी में की हालत में रखा. नौ बजे भुनभुनाते हुए मैंने ज्यो को झिंझोड़ा जो अब भी नीम बेहोशी में ही थी. पूरी कोशिश करने के बावजूद होटल से चेक-आउट करते-करते घंटा भर लग गया. सोचा कि बेटा आज तो गए काम से. माना कि सफर का अपना मजा है लेकिन सिर्फ उसी के लिए तो यहां नहीं आए हैं. हरसिल भी जीभर कर देखना है. जल्दी-जल्दी मनोज के घर की तरफ निकले क्योंकि उसके यहां नाश्ते का वादा था.

लेकिन नाश्ता भी क्या नाश्ता था साहब..कोदे (एक तरह का मोटा अनाज जिसे अंग्रेजी में मिलेट भी कहा जाता है) की गर्मागर्म रोटियां और उस पर घर का बना हुआ सफेद मक्खन..ऐसा नाश्ता तो अब पहाड़ों से भी लगभग गायब हो चुका है. अरसे से जीभ इस स्वाद को भूली हुई थी. भाभी जी के लिए मन धन्य-धन्य कर उठा.

नाश्ता निपटाकर और मनोज से विदा लेकर हरसिल के लिए रवाना हुए जो अब ७० किमी दूर था. मनोज ने बता दिया था कि भटवाड़ी से आगे १८-१९ किमी का रास्ता बहुत खराब है इसलिए आराम से जाना. वास्तव में ऐसा ही था. दरअसल गंगा को उसके मायके यानी पहाड़ों में ही इस तरह बांधने की तैयारी हो रही है कि उसके आने वाले दिन अब अंधेरी सुरंगों में बीतें. गंगोत्री से करीब सात किमी आगे भैरोंघाटी से लेकर १९० किमी दूर कोटेश्वर तक गंगा पर करीब आठ बांध परियोजनाएं हैं. इनमें से कुछ बन चुकी हैं जिनमें भारत का सबसे बड़ा बांध टिहरी भी शामिल है और कुछ बनने की तैयारी में हैं.
ये सब इस तर्ज पर बन रही हैं कि नदी एक परियोजना के लिए बनाई गई सुरंग में घुसती है और बाहर निकलती है तो वहां से दूसरी परियोजना की सुरंग का मुंह शुरू हो जाता है. यानी उसे फिर सुरंग के भीतर डाल दिया जाता है. भैरोंघाटी से लगभग १०० किमी दूर स्थित धरासू तक ऐसा ही हो रहा है. धरासू से आगे ऐसा करने का स्कोप नहीं है क्योंकि वहां तक ४० किमी दूर बनी विशाल टिहरी बांध झील का पानी रुका हुआ है. कई वैज्ञानिक कह रहे हैं कि अरे भाई लोगों, सूरज की रोशनी उन दोस्ताना जीवाणुओं के लिए बेहद जरूरी है जो गंगाजल को लंबे वक्त तक खराब नहीं होने देते, नदी सुरंगों में ही बहेगी तो वो गंगा कहां रहेगी. पर सुने कौन. शहरों के मॉल्स चमचमाते रहें उसके लिए बिजली भी तो चाहिए. भले ही गंगा और उसका पानी खत्म हो जाए.



तो साहब भटवाड़ी से आगे सड़क इसीलिए खराब थी कि वहां हाल तक लोहारीनाग और पालामनेरी नाम की ऐसी ही दो जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माणकार्य चल रहा था जो जनविरोध के चलते फिलहाल रुका हुआ है. इन जगहों से गुजरते हुए ऐसा लगा जैसे हम दूसरे विश्वयुद्ध के चलते बरबाद हो चुकी किसी जगह से होकर गुजर रहे हैं. हर तरफ मलबे के ढेर. जंग खा रही मशीनें. आधे-अधूरे ढांचे, धूल में सने घर और हैरत से हमें देखते इक्का दुक्का लोग. सड़क का कहीं पता नहीं था और सब काम अंदाजे से हो रहा था. सही कहूं तो इस परिदृश्य में अपनी टिंगू सी कार आउट ऑफ़ थे वर्ल्ड टाइप की चीज़ लग रही थी. जैसे तैसे फर्स्ट और सेकंड गियर में रेंगते रेंगते ये जगहें पीछे छूटीं.


लेकिन इसके बाद जैसे हमें हमारे कष्टों का ईनाम मिल गया. सड़क और नजारों, दोनों का कायापलट हो गया था. रास्ता बिलकुल मक्खन और सामने बर्फ से ढके पहाड़. मन प्रफुल्लित हो गया..हरसिल अब करीब तीस किमी दूर था और ऊंचाई बढ़ने के साथ दृश्य भी बदल रहा था. पेड़ों की जगह अब छोटे पौधों और सख्त चट्टानों ने ले ली थी और जगह-जगह पर बर्फ भी दिखाई दे रही थी. ठंड का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि कई जगहों पर पहाड़ों से कुलांचे मारते हुए नीचे आने वाले झरने भी या तो जम गए थे या जमने की तैयारी में थे. चूंकि यह इलाका भारत-चीन सीमा से सटा हुआ है इसलिए यहां सेना की भारी मौजूदगी दिखी. रास्ता अब बेहद खूबसूरत हो गया था. नदी की निर्मल धारा. बर्फ से ढके पहाड़. तरफ अमल-धवल गिरि के शिखरों पर बादल को घिरते देखा है का बाबा नागार्जुन वाला सीन हो रहा था. अब हरसिल बस थोड़ी ही दूर रह गया था.


बाकी अगली किश्त में....

Sunday, January 10, 2010

दिल लगा हरसिल में-3


धीरे-धीरे सांझ की लाली पहाड़ों के शिखरों से भी सिमटने लगी थी. थोड़ी ही देर में अंधेरा हो गया. मगर जब तक ऐसा हुआ तब तक हम उस इलाके में प्रवेश कर चुके थे जहां हमने अपना बचपन बिताया था. इसलिए अंधेरे में भी ड्राइविंग में आनंद आ रहा था. करीब साढ़े सात बजे उत्तरकाशी पहुंचे. सर्दियों का मौसम होने की वजह से बाजार में चहल-पहल काफी कम हो चुकी थी. सीधा टूरिस्ट रेस्ट हाउस में गाड़ी लगाई. पुरी जी के सौजन्य से इंतजाम चकाचक था. थोड़ी देर आराम किया और फिर तरोताजा होकर सोचा कि क्यों न कॉलेज के दिनों के एक मित्र को ढूंढा जाए जिससे १२ साल पहले आखिरी बार मिलना हुआ था. नाम के अलावा उसके बारे में जानकारी सिर्फ इतनी ही थी कि उसने अपना कोई होटल खोल रखा है. बाजार में टहलते कुछ लोगों से पूछा तो एक किस्मत से एक सज्जन मिल गए जो मनोज रावत यानी अपने दोस्त को जानते थे. उन्होंने बताया कि थोड़ा ही आगे गंगोत्री रोड पर है उनका होटल. हम फौरन उधर लपके. टाइम नौ के आस-पास हो चुका था और पहाड़ों में इस वक्त तक लोग सोने की तैयारी कर रहे होते हैं. सोचा कि कहीं पहुंचें तो तब तक सब अर्धनिद्रा में न पहुंच गए हों.

होटल मिल गया. तीन मंजिला. इसी में दोस्त का घर भी है. अच्छी बात रही कि वे लोग सोये नहीं थे. गर्मजोशी भरी मुलाकात हुई. १२ साल में उसकी जिंदगी में भी काफी कुछ बदल गया है. बीवी, तीन साल की एक प्यारी सी बेटी, कारोबार.. मनोज ने लानत भेजी कि मैं उसका घर छोड़कर रेस्ट हाउस में रुका. मैंने वजह बताई कि नंबर नहीं था और आधा घंटा पहले तक उसे ढूंढने के लिए लगभग अंधेरे में हाथ-पांव मारे जा रहे थे. तब जाकर उसे कुछ तसल्ली हुई. खाना वे लोग खा चुके थे और अब हमारे लिए खाना बनाने की जिद पर अड़े हुए थे. मगर हमने कहा कि होटल में खाने का भी इंतजाम है और तुम इतनी ठंड में इस चक्कर में मत पड़ो प्यारे. सुबह उसी के यहां से नाश्ता करके जाने का वादा करने के बाद ही मनोज इसके लिए तैयार हुआ. इसके बाद डेढ़-दो घंटे तक बैठे रहे और गरमागरम चाय के साथ पुराने दिनों की यादें ताजा करते रहे. फिर होटल लौटे. खाना खाया और तय किया कि अगले दिन जल्दी से जल्दी जगकर हर्सिल के लिए रवाना हो जाना है. ऐसा हमने पिछले दिन भी तय किया था मगर योजना अमल में नहीं आ सकी थी.

बाकी अगली किश्त में....

Saturday, January 9, 2010

दिल लगा हरसिल से-२



अगले दिन यानी २८ दिसंबर की सुबह उठे और खिड़की का परदा हटाया तो आनंद आ गया. हर तरफ ठंड पसरी हुई थी. हल्के कोहरे में, उससे होकर आती धूप में, पेड़ों से झरते सूखे पत्तों में और नाक-कान को जमाने के लिए तैयार रूखी हवा में. ज्यो को रोज के मुताबिक हांका लगाकर जगाना पड़ा. प्लान बना कि जल्दी से जल्दी गुरुद्वारे में दर्शन कर निकला जाएगा और शाम तक किसी भी हालत में हरसिल पहुंच जाना है. नहा-धोकर गुरुद्वारे पहुंचे. दर्शन किए. मत्था टेका. थोड़ी देर बैठकर भजनों में डूबे और फिर स्वादिष्ट प्रसाद, जो कि मेरे गुरुद्वारे जाने के लिए एक और आकर्षण होता है, खाकर वापस चल दिए. होटल द यमुना का बिल चुकाकर चेकआउट किया. गाड़ी पर ओस जमी हुई थी. इसलिए वैज्ञानिक पद्धति जिसे मनुष्य के संदर्भ में पंच-स्नान कहा जाता है, से उसे साफ करने में महज पांच मिनट लगे. अब शहंशाहे हिंद कूच के लिए तैयार थे. पौंटा साहिब को अलविदा कहकर निकल पड़े. इस कस्बे के तुरंत बाद ही उत्तराखंड राज्य की सीमा शुरू हो जाती है जहां अब सड़कें इतनी अच्छी बन गई हैं कि हैरत होती है कि यहां तो लगभग हर साल ही सड़क बनाने की जरूरत पड़ जाती है क्योंकि बरसात के हर मौसम में जगह-जगह पहाड़ों से मलबा गिरने, यहां-वहां से पानी बहने और ऐसी न जाने कितनी वजहों से सड़क की दुर्दशा हो जाती है. फिर भी उस की दशा लगभग चकाचक है. और यूपी, बिहार यहां तक कि देश की राजधानी दिल्ली में भी कई जगहों पर सड़कों की हालत कितनी खराब है. खैर...



रास्ते में सबसे पहली जगह पड़ी आसन बैराज. नदी के पानी को सिंचाई के लिए रोकने की वजह से यहां पर एक झील बन गई है. सर्दी का मौसम था और यहां प्रवासी पक्षी पखवाड़ा चल रहा था. साइबेरिया जैसे ठंडे इलाकों से आने वाले हजारों पक्षी यहां अपने शीतकालीन प्रवास का आनंद ले रहे थे. उनकी छवियां कैद करते इक्के-दुक्के पक्षी प्रेमियों को छोड़कर ये जगह बिल्कुल शांत थी. न टूरिस्टों की भीड़. न गाड़ियों की चिल्लपों. शोर था तो बस भांति-भांति के पंछियों का. मैंने और ज्यो थोड़ी देर यहां घूमे. फोटो-शोटो खींचे और फिर चल दिए.


अब हमने कालसी का रास्ता पकड़ा जहां से हमें यमुना के किनारे-किनारे चलना था. बैराज से कालसी करीब २० किलोमीटर की दूरी पर है और ये वो जगह है जहां यमुना पहाड़ से उतरकर मैदान में प्रवेश करती है. पहले हरबर्टपुर और फिर विकासनगर कस्बे से होते हुए हम कालसी पहुंच गए. नदी पर एक लंबा सा पुल बना है जिसे खत्म करने के बाद चढ़ाई का रास्ता शुरू हो जाता है. यहां पर यमुना के दर्शन हुए. शीतल और निर्मल जलधारा. एक बार फिर ताज्जुब हुआ कि कैसे दिल्ली में हमने इसे यमुना से यमुनाला बना दिया है.

अब पहाड़ का रास्ता शुरू हो चुका था. हमें पहले नैनबाग और डामटा होते हुए बड़कोट पहुंचना था जो यहां से करीब ८० किलोमीटर दूर है. जंगल से गुजरते हुए आगे बढ़े तो एक जगह चकराता बाएं और यमुनोत्री दायें का बोर्ड लगा दिख गया. अपना रास्ता पकड़ा और आगे चलकर उसकी पुष्टि के लिए सड़क किनारे एक भले आदमी से जानकारी चाही तो उसने कहा कि यही है. हालांकि बाद में हमें पता चला कि वो मुख्य सड़क नहीं बल्कि सिर्फ छोटे वाहनों के लिए बना रास्ता था. खैर, हम भी कोई टाटा ४०७ लेकर तो जा नहीं रहे थे, इसलिए आगे बढ़ते रहे. अच्छी बात ये थी कि ये रास्ता बीसेक किलोमीटर आगे जाकर मुख्य सड़क में ही मिल गया. यमुना के किनारे-किनारे सुंदर नजारों का लुत्फ लेते हुए हम चलते रहे और ढेर सारी इधर की, उधर की, काम की, बेकार की..बातें करते रहे. ज्यो के साथ यात्रा करने में अच्छी बात ये है कि मेरी तरह वो भी मंजिल पर पहुंचने की जल्दी के चक्कर में सफर के मजे की ऐसीतैसी नहीं करती. इसलिए जहां-जहां भी हमें खूबसूरत झरने और चमकते हिमशिखर दिखते हम कुछ देर के लिए रुक जाते और उन्हें निगाहों और कैमरों में जीभरकर कैद करने के बाद ही आगे बढ़ते.


नदी के साथ-साथ चलते पहले नैनबाग आया. यहां के सेब काफी मशहूर हैं. फिर डामटा जहां पहुंचते-पहुंचते दोपहर हो चुकी थी. पेट में चूहे दौड़ने लगे थे. अरसे से किसी पहाड़ी ढाबे में मटन खाने का मन था. पता किया तो पता चला कि वहां मटन अब बनता ही नहीं. वजह, बहुत मंहगा हो गया है. यानी अब वहां बकरे से ज्यादा मुर्गे की अम्मा खैर मनाने लगी है. खैर, कोई चारा नहीं था. इसलिए चिकन करी ही मंगवा ली जो ठीक-ठाक थी और ये भी पाककला से ज्यादा पहाड़ के हवा-पानी का असर था.


होटल में कुछ पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरें फ्रेम में टंगी हुईं थीं. जिज्ञासावश पास जाकर देखा तो उनमें राजकपूर फुरसत से खाना खाते हुए दिखे. पता चला कि ८० के दशक में अपनी फिल्म राम तेरी गंगा मैली की शूटिंग के सिलसिले में हरसिल जाते वक्त वे डामटा के इस होटल में भी रुके थे और खाना खाया था. क्या बात है...होटल मालिक की तो धन्य धन्य हो गई.


डामटा से बड़कोट करीब ४० किमी दूर है. यमुनोत्री जाने से पहले मुख्य कस्बा यही है जहां सारी सुविधाएं हैं इसलिए बहुत से यात्री यहां रात्रि विश्राम करते हैं और फिर सुबह-सुबह यमुनोत्री के लिए रवाना होते हैं. इस वजह से यहां बड़ी संख्या में होटल, गेस्ट हाउस और टूरिस्ट लॉज बन गए हैं. यहां पहुंचते-पहुंचते सांझ गिरने लगी थी और साफ हो चुका था कि आज हरसिल नहीं पहुंच सकेंगे. अपने स्थानीय परम मित्र सुरेंद्र पुरी जी को फोन लगाया तो उन्होंने भी इसकी पुष्टि की कि महाराज आज तो हरसिल भूल जाओ, आपका जुगाड़ उत्तरकाशी के एक बढ़िया गेस्ट हाउस में करा रखा है, वहीं रुक जाओ. हमने भी सोचा कोई गम नहीं. ७० किमी पहले उत्तरकाशी में ही रुक जाते हैं.पुराने दोस्तों से ही मिल लेंगे.

बाकी अगली किश्त में...

Thursday, January 7, 2010

दिल लगा हरसिल से-1


साल के आखिर में ऑफिस में छुट्टियां हुईं तो मैंने और ज्यो यानी मेरी श्रीमती जी ने सोचा कि कहीं घूम आएं. प्रोग्राम तो था चोपता का मगर आखिर में तय हुई हरसिल. उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में बसी एक खूबसूरत घाटी. ज्यो ने काफी लंबे वक्त से मंसूबे बांध रखे थे यहां जाने के. चूंकि पिछली कुछ यात्राएं मित्र-मंडली के साथ हो चुकीं थीं इसलिए इरादा किया कि इस बार मियां-बीवी अकेले ही घूमेंगे. हरसिल गंगोत्री से करीब २० किलोमीटर पीछे है. वैसे तो यहां बारामासी ठंड रहती है मगर दिसंबर में जाने का मतलब था कड़ाके की ठंड से निपटने की तैयारी. इसलिए ढेर सारे गर्म कपड़े पैक कर लिए. हरसिल दिल्ली से करीब पांच सौ किलोमीटर दूर है. जाने का परंपरागत रास्ता है मेरठ-मुजफ्फरनगर-रुड़की-ऋषिकेश-चंबा-धरासू-उत्तरकाशी-भटवाड़ी होते हुए. मगर चूंकि मैं इस रास्ते पर कई बार जाने की वजह से चट चुका था इसलिए सोचा कि इस बार किसी अलग रास्ते से चला जाए. नेट पर थोड़े से हाथ भांजे और रहगुजर तय हुई दिल्ली-पानीपत-करनाल-कुरुक्षेत्र-यमुनानगर-पौंटा साहिब-कालसी-डामटा-नैनबाग-बड़कोट और फिर धरासू-उत्तरकाशी होते हुए हरसिल.

जाने वाले दिन ऐसा माहौल बना कि दो बजे ही घर से रवाना हो पाए. कार का चेकअप कुछ दिन पहले करवा लिया था इसलिए थोड़ी तसल्ली थी कि लंबी यात्रा से पहले धन्नो की सेहत पूरी तरह से टंच है.

वैसे तो अपन हर हालात में मन लगा लेने वाले इंसान हैं मगर यदि रास्ता नया और अनदेखा हो तो अपने लिए यात्रा का रोमांच दोगुना हो जाता है. दिल्ली से करनाल और कुरुक्षेत्र तक का रास्ता तो एकदम मक्खन है. डबल लेन. कुरुक्षेत्र सिटी में घुसने से पहले ही दांये हाथ के लिए यमुनानगर के लिए सिंगल लेन सड़क जाती है. यह भी बुरी नहीं. बुरा सपना शुरू होता है यमुनानगर के बाद. हम यमुनानगर पहुंचे और वहां से ३५ किमी दूर पौंटा साहिब का रास्ता पूछा तो एक भले आदमी ने बताया कि साहब, वहां जाने वाली सड़क का तो बहुत बुरा हाल है. और रात का वक्त, न ही

जाएं तो बेहतर. हां, अगर यहां से १२ किमी दूर बिलासपुर तक चले जाएं तो वहां से खिज्राबाद नाम के कस्बे और फिर वहां से पौंटा के लिए बढ़िया सड़क मिल जाएगी. वैसे तो ये १२ किमी भी नर्क से कम नहीं पर उसके बाद राहत है. वरना आम रास्ते से तो गालियां देते हुए ही जाएंगे.

भले आदमी की बात मानकर हमने बिलासपुर का रास्ता पकड़ा. जिसे रास्ता कहा ज रहा था वह था भी या नहीं कहा नहीं जा सकता. बस यही तसल्ली थी कि उस पर गाड़ियां आ जा रहीं थीं. एक साइकिल वाला आधे घंटे तक हमसे आगे चलता रहा और हम कभी फर्स्ट तो कभी सेकेंड गियर में रिरियाते रहे.

खैर..बिलासपुर पहुंचे और जहां पर खिज्राबाद का रास्ता पूछा तो किस्मत से रास्ता सामने ही था. सड़क संकरी थी मगर अच्छी थी. ट्रैफिक भी न के बराबर था. १२ किमी के हिचकोलों के बाद धन्नो को आराम आया. तबियत से भागी. खिज्राबाद से सड़क इतनी बढ़िया थी कि पौंटा साहिब तक का सफर बहुत जल्दी तय हो गया.


पौंटा साहिब सिक्खों का पवित्र स्थान है. कहा जाता है कि गुरू गोविंद सिंह यहां पर कुछ समय के लिए रुके थे. यहां पर एक विशाल गुरूद्वारा भी है जहां गुरूजी के कुछ हथियार भी रखे हुए हैं. यहां से पहाड़ शुरू होते हैं. और इस बात का पता यहां के हवा-पानी से ही चल जाता है. मैदानों में रहने वाले किसी भी परम पहाड़ी के मन काफी अरसे के बाद पहाड़ों को देखकर जो आनंद भरता है उसका बयां शब्दों में करना बड़ा मुश्किल है. मुझे तो लगता है कि पहाड़ देखते ही मेरी उम्र में एक सांस और बढ़ जाती है.

यहां जब पहुंचे तो रात हो चुकी थी. पहले ही पता कर लिया था कि यहां पर एचपीटीडीसी का एक अच्छा होटल है. एक कमरा किराए पर ले लिया. ६०० रुपए में सस्ता, सुंदर, टिकाऊ इंतजाम. हीटर,गीजर सबकुछ. अपनी बल्ले-बल्ले हो गई. सामान पटककर और हाथ मुंह धोकर हम घूमने निकले. रात के नौ बज गए थे और सड़कों पर भीड़ बहुत कम हो गई थी. गुरुद्वारे के सामने एक फास्ट-फूड जुगाड़ में चाउमिन, वेज मोमोज और वेज सूप का लुत्फ लिया. पहाड़ की हवा में एक खास बात होती है कि कुछ भी अगर बहुत बुरा न बना हो तो जायकेदार ही लगता है. मनभरकर खाया. हालांकि ज्यो को खाना ज्यादा पसंद नहीं आया. मगर गौर करें कि मनभर और मन भर कर खाने के बाद. खैर.. पेटपूजा के बाद वापस होटल लौट आए.

बाकी अगली किश्त में